व्यंग्य: महाराष्ट्र का नाटक और आर्ट गैलरी में चप्पल

ऋषि कटियार पिछली बार जब किसी काम से मुंबई जाना हुआ तो कॉलेज के कई दोस्तों के कारण जो कहते नहीं अघाते थे 'बहुत दिन हो गए यार, कभी मुंबई आओ तो मिलते हैं।' मैंने ट्रिप दो दिन बढ़ा ली। फिर जब मिलने का वक़्त आया तो वे महानगर के काम को अपने कंधों पर उठाए हुए थे और मिलने का समय नहीं निकाल पाए। बड़े-बड़े शहरों में ऐसी छोटी-छोटी बातें होती रहती हैं। खैर, यूं ही अकेले निरुद्देश्य घूमते हुए समय बिताने के लिए मैं एक आर्ट गैलरी में जा घुसा। आर्ट गैलरी अब तक सिर्फ फिल्मों में देखी थी। यहां आर्ट गैलरी में बहुत बड़-बड़े चित्र थे जिनमें कई आकार प्रकार, निराकार टाइप के चित्र थे और कुछ भी स्पष्ट नहीं था। लगता था मानो किसी आर्टिस्ट ने फ्रस्टेशन में कई सारे रंग बिखरा दिए हों, या कूंची से कोंच-कोंच कर कैनवास के सीने में घोंप दिए हों। पर एक चित्र मुझे सबसे विचित्र लगा क्योंकि वही एक मेरी समझ में आया। 6x4 फीट के कैनवास पर एक बड़ी सी बिरंगी चप्पल बनी हुई थी। चप्पल, वही चप्पल जिसे पहनकर आने पर गैलरी में घुसना मना था (ओनली शूज)। यहां पूरे राजसी सम्मान के साथ विराजमान थी। काफी देर खड़ा होकर मैं उसकी सुंदरता निहारता रहा या औचित्य समझने की कोशिश करता रहा। आखिर क्यों? जहां मैं बावलों की तरह उसे घूर रहा था। कुछ सम्मानित व्यक्ति आपस में अंग्रेजी में उस कला कृति को मुग्ध हो देख रहे थे और उस पर गहन चर्चा कर रहे थे। उसको मास्टरपीस बोल रहे थे। ब्रश स्ट्रोक, डेप्थ, कलर कॉम्बिनेशन, इमेजिनेशन, ब्रिलियंस आदि शब्दों में साथ उसमें छुपे गूढ़ दर्शन पर चर्चा कर रहे थे। खैर, कुछ देर सर धुनने के बाद मैं अपनी मंद बुद्धि को दोष देते हुए बाहर निकल आया। दरअसल ये कलाकृतियां, आर्ट, धर्म, राजनीति, कानून आदि सबकी समझ में आने वाली बातें हैं ही नहीं। आर्टिस्ट अगर बहुरंगी कौवा भी बनाएगा तो उसके पीछे बहुत गहरी समझ होगी जो सबकी समझ में नहीं आएगी। वह ऊंचे दर्जे की कला है जो आमजन समझ ही नहीं सकता। वरना क्या कारण हो सकता है कि घटिया फिल्में सैकड़ों करोड़ कमाती हैं। ढोंगी बाबाओं के लाखों भक्त होते हैं, बिग बॉस के लाखों चाहने वाले हैं, कैमरे में पकड़े गए अपराधी भी सालों साल केस के बाद बेगुनाह निकल आते हैं। पिछले दिनों महाराष्ट्र में बीजेपी, की एनसीपी, राज्यपाल ने आधी रात में मिलकर संविधान पर 'सर्जिकल स्ट्राइक' कर दी। अगले दिन इसे मास्टर स्ट्रोक कहा गया। इस महान कार्य करने वाले को 'चाणक्य' कहा गया। राजनीति की पकड़, समझबूझ, नॉलेज पाए कसीदे पढ़े गए और मुझे फिर मुंबई की आर्ट गैलरी में एक बड़े से फ्रेम में टंगी वह चप्पल याद आई।


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