ऋषि कटियार प्रिय लेखक मित्रों, बुद्धिजीवियों, क्रांतिकारियों, समाज सेवकों, स्वंयभू मठाधीशों और फलाना-ढिकाना जी, शायद बिजी होने की वजह से आपको न्यूज पता न चली हो और वैसे भी यह अंग्रेजी अखबारों के कोने में एक छोटी सी दबी छुपी हुई सी खबर भी थी। खबर यह है कि IIM बैंगलोर की फीस 21 लाख से 23 लाख कर दी गई जिसमें टैक्स, मेस फीस, सिक्यॉरिटी डिपॉजिट आदि अलग से है। है ना, पता नहीं चला ना या कोई फर्क नहीं पड़ा। आप वही हैं ना, जिन्होंने अभी कुछ दिन पहले ही दिल्ली में एक विश्वविद्यालय की फीस बढ़ने पर क्रांति मचाई थी। महाकाव्य रचे थे, गीत गाए थे। अपनी कलम की धार पैनी की थी। मुफ्त शिक्षा, समान अधिकार, गरीबों को शिक्षा से वंचित करने की साजिश, शिक्षा पर सबका अधिकार, दुनियाभर के शिक्षा मॉडल्स की विवेचना की थी। नहीं, मुझे इससे दिक्कत नहीं कि तब आप क्यों बोले थे। मुझे इससे दिक्कत है कि अब आप चुप क्यों हैं? यह जो सिलेक्टिव अप्रोच है ना, मुझे उससे दिक्कत है। नहीं, मुझे उस यूनिवर्सिटी के छात्रों से भी खुन्नस नहीं, आखिर मुफ्त का माल कौन नहीं चाहता? मुझे तो आपसे जवाब की दरकार है जो अचानक से धृतराष्ट्र हो गए है...